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दुलारी बाई के मंचन ने जीता दर्शकों का दिल, हास्य-व्यंग्य के साथ दिया गहरा संदेश

दुलारी बाई के मंचन ने जीता दर्शकों का दिल, हास्य-व्यंग्य के साथ दिया गहरा संदेश

*संवाददाता आरबी सोनू मीणा*

शुजालपुर। तीन दिवसीय भूमिका नाट्य उत्सव एवं सम्मान समारोह के अंतर्गत मालवांश संस्था द्वारा लोक नाटक *‘दुलारी बाई’* का सफल मंचन किया गया। प्रसिद्ध निर्देशक जितेन्द्र परमार के निर्देशन में प्रस्तुत यह नाटक मालवी बोली में मंचित हुआ, जिसने दर्शकों को खूब आकर्षित किया। मणि मधुकर द्वारा रचित यह नाटक हास्य-व्यंग्य पर आधारित लोक प्रस्तुति है, जो अत्यधिक कंजूसी और धन के लालच पर तीखा कटाक्ष करता है। नाटक की कहानी दुलारी नामक एक अविवाहित और अत्यंत कंजूस महिला के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी संपत्ति बचाने के लिए विवाह नहीं करती। कहानी में मोड़ तब आता है, जब ‘कल्लू भांड’ नामक बहरूपिया राजा का वेश धारण कर दुलारी को अपने जाल में फंसाता है और उससे विवाह कर उसकी संपत्ति हड़पने की योजना बनाता है। वहीं एक अन्य प्रसंग में दुलारी को ऐसा वरदान मिलता है कि वह जिस वस्तु को छूती है, वह सोने में बदल जाती है। लालच में आकर वह खाने-पीने की चीजों और यहां तक कि अपने पति को भी सोना बना देती है, जिससे वह खुद ही संकट में पड़ जाती है। अंततः दुलारी को एहसास होता है कि धन और सोने से अधिक महत्वपूर्ण मानवीय रिश्ते, प्रेम और ईमानदारी हैं। नाटक ने मनोरंजन के साथ-साथ समाज को एक सार्थक संदेश भी दिया। मंच पर कलाकारों में मनाली मैना, योगेश चौहान, आयुष रॉय, दर्शन पांडे, रविकांत, सदाशिव, दीपक परमार एवं जितेन्द्र परमार ने सशक्त अभिनय किया। वहीं संगीत निर्देशन सुरेंद्र वानखेड़े एवं संकेत भरत दुबे द्वारा किया गया, जिसने प्रस्तुति को और प्रभावशाली बना दिया।

दुलारी बाई के मंचन ने जीता दर्शकों का दिल, हास्य-व्यंग्य के साथ दिया गहरा संदेश

*संवाददाता आरबी सोनू मीणा*

शुजालपुर। तीन दिवसीय भूमिका नाट्य उत्सव एवं सम्मान समारोह के अंतर्गत मालवांश संस्था द्वारा लोक नाटक *‘दुलारी बाई’* का सफल मंचन किया गया। प्रसिद्ध निर्देशक जितेन्द्र परमार के निर्देशन में प्रस्तुत यह नाटक मालवी बोली में मंचित हुआ, जिसने दर्शकों को खूब आकर्षित किया। मणि मधुकर द्वारा रचित यह नाटक हास्य-व्यंग्य पर आधारित लोक प्रस्तुति है, जो अत्यधिक कंजूसी और धन के लालच पर तीखा कटाक्ष करता है। नाटक की कहानी दुलारी नामक एक अविवाहित और अत्यंत कंजूस महिला के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी संपत्ति बचाने के लिए विवाह नहीं करती। कहानी में मोड़ तब आता है, जब ‘कल्लू भांड’ नामक बहरूपिया राजा का वेश धारण कर दुलारी को अपने जाल में फंसाता है और उससे विवाह कर उसकी संपत्ति हड़पने की योजना बनाता है। वहीं एक अन्य प्रसंग में दुलारी को ऐसा वरदान मिलता है कि वह जिस वस्तु को छूती है, वह सोने में बदल जाती है। लालच में आकर वह खाने-पीने की चीजों और यहां तक कि अपने पति को भी सोना बना देती है, जिससे वह खुद ही संकट में पड़ जाती है। अंततः दुलारी को एहसास होता है कि धन और सोने से अधिक महत्वपूर्ण मानवीय रिश्ते, प्रेम और ईमानदारी हैं। नाटक ने मनोरंजन के साथ-साथ समाज को एक सार्थक संदेश भी दिया। मंच पर कलाकारों में मनाली मैना, योगेश चौहान, आयुष रॉय, दर्शन पांडे, रविकांत, सदाशिव, दीपक परमार एवं जितेन्द्र परमार ने सशक्त अभिनय किया। वहीं संगीत निर्देशन सुरेंद्र वानखेड़े एवं संकेत भरत दुबे द्वारा किया गया, जिसने प्रस्तुति को और प्रभावशाली बना दिया।

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